Varun Aaron की पूरी कहानी एक शब्द में समाई है, स्पीड। झारखंड से भारत की टेस्ट कैप तक का उनका सफर सिर्फ रफ्तार का नहीं, बल्कि दर्द, समझ और आत्मविश्वास का भी रहा।
वे 150 किमी प्रति घंटा की रफ्तार से गेंद फेंकते थे, लेकिन उससे भी ज्यादा तेज उनका जुनून था।
बचपन प्रेरणा
बचपन से ही उन्हें हर तेज चीज आकर्षित करती थी। फाइटर जेट, कमांडो कॉमिक्स और वेस्टइंडीज के तेज गेंदबाज उनके हीरो थे। उनके पिता हर रविवार कैलीप्सो क्लासिक्स देखते और एंडी रॉबर्ट्स, माइकल होल्डिंग जैसे दिग्गजों की चर्चा करते।
दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में एरॉन बल्लेबाज थे। 12 साल की उम्र में कोच ने गुस्से में उन्हें गेंदबाजी करने को कहा और उन्होंने इतनी तेज गेंद फेंकी कि सब चौंक गए। वहीं से उनका रास्ता बदल गया।
रफ्तार सफर
16 साल की उम्र में लफबरो यूनिवर्सिटी में बायोमैकेनिकल टेस्ट के दौरान उन्होंने 137 किमी प्रति घंटा की स्पीड दर्ज की। बाद में उनके करियर की रफ्तार 150 किमी प्रति घंटा से ऊपर पहुंची।
वे कहते हैं कि वे हमेशा दूसरों से तेज थे, लेकिन असली बात यह थी कि वे तेज बने रहना चाहते थे।
मेंटोर प्रभाव
एमआरएफ पेस फाउंडेशन में ट्रेनिंग के दौरान Dennis Lillee ने उनसे कहा था कि फास्ट बॉलिंग एक लाइफस्टाइल है।
एरॉन ने इस बात को पूरी तरह अपनाया। 17 साल तक उन्होंने मुश्किल से ही कोई लंबी छुट्टी ली। फिटनेस उनके लिए आदत नहीं, जुनून थी। 5 किमी 25 मिनट से कम में दौड़ना उनका लक्ष्य था और पीक फिटनेस में वे 19 मिनट में यह दूरी पूरी कर लेते थे।
चोट संघर्ष
तेज गेंदबाजी शरीर के लिए आसान नहीं होती। रीढ़ पर अस्वाभाविक दबाव पड़ता है। एरॉन को अपने करियर में आठ बार स्ट्रेस फ्रैक्चर झेलने पड़े। नसों पर असर पड़ा और पैरों में सुन्नपन तक महसूस हुआ।
करीब ढाई साल का लंबा ब्रेक उनके करियर के लिए बड़ा झटका था। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उनका विश्वास था कि वे भारत के लिए फिर खेलेंगे।
आत्म खोज
2014 में वापसी से पहले उन्होंने अपनी गेंदबाजी एक्शन खुद सुधारी। उनका बैक फुट गलत एंगल पर लैंड करता था, जिससे चोटें बढ़ती थीं। कई कोच समाधान नहीं दे पाए।
नेशनल क्रिकेट अकादमी में एक दिन उन्होंने खुद वीडियो रिकॉर्ड किया और शरीर को प्राकृतिक फ्लो में छोड़ा। अचानक उनका बैक फुट सेमी ओपन हो गया और यही उनकी समस्या का हल था।
यह पल उनकी आत्म खोज की सबसे बड़ी जीत थी।
यादगार पल
इंग्लैंड के खिलाफ 2011 में डेब्यू, ओल्ड ट्रैफर्ड में अहम विकेट, स्टुअर्ट ब्रॉड को लगी बाउंसर और बाद में माफी, बेंगलुरु में हैशिम अमला को आउट करना-ये सभी पल उनके करियर की यादगार कहानियां हैं।
वे कहते हैं कि मैदान पर वे सिर्फ अपना काम कर रहे थे, लेकिन मैदान के बाहर हर खिलाड़ी इंसान होता है।
कठिन क्षण
फिलिप ह्यूज की दुखद मौत ने उन्हें भी झकझोरा। लेकिन उन्होंने कभी अपनी रफ्तार कम करने का विचार नहीं किया। उनके लिए स्पीड ही पहचान थी।
आईपीएल में दिल्ली, आरसीबी, पंजाब और राजस्थान के साथ उनका सफर मिला जुला रहा। कुछ शानदार प्रदर्शन, कुछ सीजन चोटों में गुजर गए।
आत्मस्वीकार
अपने करियर के अंत में एरॉन ने कहा कि काश वे थोड़ा कम जानते, बस गेंद फेंकते और आगे बढ़ जाते। लेकिन फिर वे मानते हैं कि खेल को गहराई से समझना ही उनकी लंबी उम्र का कारण बना।
कभी कभी ज्यादा जानकारी उलझा देती है, लेकिन उनके लिए वही समझ जीवनदान साबित हुई।
विरासत कहानी
झारखंड से MS Dhoni के बाद भारत के लिए खेलने वाले एरॉन उस दौर का हिस्सा थे जिसने राज्य को क्रिकेट मानचित्र पर मजबूत किया।
आज भी वे दौड़ते हैं, फिटनेस पर ध्यान देते हैं और एडवेंचर का सपना देखते हैं। तेज रफ्तार सिर्फ उनके करियर की पहचान नहीं थी, बल्कि उनके व्यक्तित्व का हिस्सा है।
शायद यही रफ्तार उन्हें गिराती भी रही और हर बार उठाकर फिर खड़ा भी करती रही।
FAQs
वरुण एरॉन की अधिकतम स्पीड कितनी थी?
150 किमी/घंटा से अधिक।
उन्हें कितनी बार स्ट्रेस फ्रैक्चर हुआ?
आठ बार।
उनका डेब्यू कब हुआ?
2011 में इंग्लैंड के खिलाफ।
सबसे यादगार विकेट कौन सा?
हाशिम अमला का विकेट।
उन्होंने क्या अफसोस जताया?
ज्यादा सोचने की बात कही।









